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Soldering - सोल्डरिंग किसे कहते हैं?‌ | विधि

Soldering - सोल्डरिंग किसे कहते हैं?‌ | विधि

सोल्डरिंग (Soldering) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक वस्तुओं को पिघलाकर और एक फिलर धातु को जोड़ में डाल दिया जाता है, फिलर धातु का गलनांक जोड़ने वाली धातु की तुलना में कम होता है। वेल्डिंग के विपरीत, सोल्डरिंग में काम के टुकड़ों को पिघलाना शामिल नहीं है।

सोल्डरिंग किसे कहते हैं?‌ | soldering kise kahate hain?

किन्ही दो या दो से अधिक धातु के भागों को सोल्डर के द्वारा जोड़ने की प्रक्रिया को सोल्डरिंग (Soldering) कहते हैं। यह एक प्रकार का कच्चा जॉइंट होता है जोकि अधिक कंपन होने पर खुल भी सकता है और अधिक लोड को सहन नहीं कर सकता है। इसको दूसरे नाम नर्म टाँका लगाया जाना भी कहते हैं।

सोल्डरिंग में एण्टीमनी व बिस्मथ का उपयोग गलनांक को बढ़ाने व घटाने में किया जाता है। इस प्रक्रिया में जोड़ी जाने वाली सतहें अपना वास्तविक स्वरूप नहीं रख पाती हैं। परन्तु यदि दोनों सतहें जिनको जोड़ना है उनके वास्तविक स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए जोड़ना हो तब उनको सोल्डरिंग (Soldering) द्वारा आसानी से जोड़ा जा सकता है। ऐसा इसलिए कर सकते हैं क्योंकि इसमें जोड़े जाने वाली सतहों को पिघलाने की जरुरत नहीं होती है। बल्कि इसमें धातुओं को उनके गलनांक से काफी कम तापमान पर ही स्पैल्टर या सोल्डर फिलर धातु के रूप में उपयोग होती है। इसका गलनांक 450°C से कम रहता है।

सोल्डरिंग कैसे की जाती है?

यह प्रक्रिया मुख्यत: चार पदों में पूरी होती है, जो कि निम्न प्रकार से हैं-

  1. सोल्डरिंग आयरन को गर्म करना - इस प्रक्रिया को करने के लिए सबसे पहले सोल्डरिंग आयरन को गर्म करने की आवश्यकता होती है। इसको गर्म करने के लिए ब्लो लैम्प, गैस फ्लेम या ब्लो टार्च का उपयोग किया जाता है। सोल्डरिंग आयरन (Soldering Iron) की बिट को केवल उतना ही गर्म करना चाहिए, जितने से सोल्डर आसानी से पिघल सके।
  2. टिनिंग - सोल्डरिंग आयरन की बिट को गर्म करने के बाद उसकी टिप पर सोल्डर (Solder) की परत चढ़ाना टिनिंग (Tinning) कहलाता है। इसको करने से पहले सोल्डरिंग आयरन की बिट को अच्छी तरह से रेती (File) द्वारा साफ कर लेना चाहिए। इसको साफ करने के बाद बिट को गर्म करके उस पर नौसादर रगड़कर सोल्डर की परत चढ़ा दी जाती है।
  3. टेकिंग - यह एक प्रक्रिया है, सोल्डरिंग शुरू करने से पहले जोड़ पर टेकिंग की जाती है। यह पहले सेंटर में फिर उसके बाद किनारों पर की जाती है, जिससे कि जोड़े जाने वाले भागों का अलाइनमेंट बना रहे।
  4. फ्लोटिंग - इस प्रक्रिया में जॉब के जोड़ की बाहरी व आन्तरिक सतह पर फ्लक्स लगाकर जॉब को लकड़ी के ब्लॉक पर 45° के कोण पर पकड़ा जाता है। इसके बाद सोल्डर के टुकड़ों को जोड़ पर रखकर उनको सोल्डरिंग आयरन द्वारा पिघलाया जाता है।

सोल्डरिंग की कितनी विधि होती हैं?

  1. सोल्डरिंग आयरन विधि
  2. सोल्डरिंग टॉर्च विधि
  3. इण्डक्शन विधि
  4. स्प्रे विधि
  5. डिप एण्ड वेव विधि
  6. रेजिस्टेन्स विधि
  7. फर्नेश एण्ड हॉट प्लेट विधि
  8. कण्डेन्सेशन विधि
  9. अल्ट्रासोनिक विधि

सोल्डरिंग आयरन विधि क्या है?

यह सबसे पुरानी विधि है, इस विधि को करने के लिए एक सोल्डरिंग आयरन का उपयोग किया जाता है, जिसकी टिप तांबा (Copper) की बनी होती है। इसको गरम करने के लिए तेल, कोक, बिजली या कोई गैस उपयोग की जाती है। आज के समय में अधिकतर बिजली वाले ही सोल्डरिंग आयरन (Soldering Iron) उपयोग में लाए जाते हैं यह बाजार में 15 वाट से लेकर 100 वाट तक की क्षमता में मिल जाते हैं, यह दो प्रकार के होते हैं-

  1. बाहर से गर्म होने वाले - इस प्रकार के सोल्डरिंग आयरन भट्टी, गैस बर्नर या ब्लो लैम्प से गर्म किए जाते हैं। यह बिट के वजन के आधार 250 ग्राम से 1 किग्रा तक के बाजार में मिलते हैं। अधिक वजन वाले सोल्डरिंग आयरन अधिक तापमान को स्टोर कर सकते हैं और यह अधिक देर तक काम कर सकते हैं।
  2. अन्दर से गर्म होने वाले - इस प्रकार के सोल्डरिंग आयरन बिजली द्वारा गर्म किए जाते हैं। इनमें अंतर यह होता है कि यह लगातार गर्मी दे सकते हैं। सोल्डरिंग प्रक्रिया को करते समय, यह गर्म होते रहते हैं। इनमें एक बिजली का एलीमेंट बिट को लगातार गर्मी देता रहता है।

soldering kaise karte hain?

सोल्डरिंग (Soldering) करने से पहले सोल्डरिंग आयरन की बिट को हल्का गर्म करने के बाद रेती (File) या ईंट से रगड़कर ऊपरी सतह (Surface) पर बनी हुई ऑक्साइड की परत को हटा देना चाहिए।

इसके बाद सोल्डरिंग आयरन की बिट पर रेजिन व नौसादर के फ्लक्स की एक मोटी परत चढ़ा दी जाती है। यह प्रक्रिया निम्न तरह से की जाती है-

  • सबसे पहले सोल्डरिंग (Soldering) करने वाली सतहों से ग्रीस, तेल व ऑक्साइड आदि को साफ कर देते हैं।
  • उसके बाद जोड़ी जाने वाली सतहों पर उचित फ्लक्स को लगा देते हैं।
  • ज्वाइंट के अनुसार उचित साइज के सोल्डरिंग आयरन को एक निश्चित तापमान तक गर्म करते हैं। इसके बाद फ्लक्स लगी सतह को सम्पर्क में लाकर गर्म करते हैं।
  • इसके बाद सोल्डरिंग आयरन की नोंक पर सोल्डर लगाकर उसे सोल्डर के साथ-साथ चलाते हैं। इसमें सोल्डर की गति जोड़ की गहराई के साथ रखते हैं। ऐसा इसलिए करते हैं कि जिससे सोल्डर पिघलकर जोड़ की गहराई तक जा सके। जब सोल्डरिंग आयरन (Soldering Iron) को हटा लेते हैं, तब सोल्डर ठण्डा होकर जोड़ बनाता है। ठण्डा होने के समय जोड़/ज्वाइंट को हिलाना नहीं चाहिए। ऐसा इसलिए नहीं करना चाहिए यदि यह हिल जाएगा तब जोड़ में दरारें पड़ने की सम्भावना बनी रहती है।
  • इतना काम होने के बाद कोरोसिव फ्लक्स को साफ करते हैं। इसको यदि साफ नहीं करेंगे तब जोड़ी गई सतहों को जंग लग सकती है।

सोल्डरिंग टॉर्च विधि क्या है?

इस विधि से सोल्डरिंग करने के लिए गैस टॉर्च द्वारा ऊष्मा प्राप्त की जाती है। इसमें टॉर्च के द्वारा जॉब को बहुत तेजी से गर्म किया जाता है। ऑक्सी एसीटिलीन फ्लेम के अलावा अन्य कम ताप वाली फ्लेम जैसे- प्रोपेन, ब्यूटेन आदि भी सोल्डरिंग (Soldering) करने के लिए उपयोग की जा सकती हैं। इस प्रकार की विधि का उपयोग बहुत बड़े व भारी-भरकम जॉब को सोल्डर करने, बिजली की सप्लाई के लिए तारों में लग्स लगाने तथा जेनरेटर आदि कम्यूटेटर के कनेक्शन बनाने के लिए किया जाता है।

सोल्डरिंग के फायदे क्या हैं?

  1. सोल्डरिंग प्रक्रिया में जोड़ लगाने में कम लागत आती है।
  2. इसमें कम तापमान पर आसानी से जोड़ लगाया जा सकता है।
  3. सोल्डरिंग (Soldering) करने के लिए विशेष अनुभव की जरूरत नहीं होती है।
  4. सोल्डरिंग द्वारा छोटे पार्ट्स, तार व पतली चादरों को अस्थायी रूप से जोड़ा जा सकता है।

सोल्डरिंग के नुकसान क्या हैं?

  1. इसके द्वारा बड़ी व मोटी प्लेटों पर जोड़ नहीं लगाए जा सकते हैं।
  2. इसके द्वारा लगा जोड़ कमजोर होता है, जिससे यह आसानी से खुल जाता है।

सोल्डरिंग करते हुए कौन सी सावधानियां रखी जानी चाहिए?

यह प्रक्रिया करते समय बहुत से बिन्दुओं को ध्यान में रखना चाहिए, जिससे कि सोल्डरिंग (Soldering) के समय होने वाली समस्याओं से बचा जा सके। यह बिन्दु निम्न प्रकार से हैं-

  1. इसको करते समय सोल्डरिंग आयरन को अच्छी तरह से गर्म कर लेना चाहिए।
  2. सोल्डरिंग में उपयोग किए जाने वाले सोल्डर का गलनांक जोड़े जाने वाली धातुओं के गलनांक से कम होना चाहिए।
  3. सोल्डर, धातु सतहों पर आसानी से फैलने वाला होना चाहिए।

सोल्डरिंग कितना मजबूत है?

यह अस्थायी जोड़ बनाने के लिए उपयोग की जाती है। यह वेल्डिंग व ब्रेजिंग से कमजोर होती है।

सोल्डरिंग वायर का आम नाम क्या है?

इसका आम नाम रांगा है। इसको गांव की शॉप पर इसे रांगा के नाम से भी जानते हैं।